Buddhi Pruthvi ka Dukh (बूढ़ी पृथ्वी का दुख)

 Buddhi Pruthvi ka Dukh (बूढ़ी पृथ्वी का दुख)

कविता और कवयित्री का नाम क्या है ?


कविता का नाम बूढ़ी पृथ्वी का दुख है और कवयित्री का नाम निर्मला पुतुल है।



यह कविता किस बारे में?


इस कविता के सारे अंश में पर्यावरण के दुखो के बारे में वर्णन किया जा रहा है |पूरी कविता इंसानो के लिए प्रश्नो के तरीके से रखी गयी है।



कवयित्री ने इस कविता में पेड़ो के बारे में क्या बताया है ?


कवयित्री पेड़ो के बारे में कल्पना करते हुए इस कविता में यह बताया है की पेड़ भी डरा हुआ होता है। वह भी चीखता चिल्लाता है और बचाव के लिए लोगो को पुकारता है, जो सपना देखता है की कोई चमकती हुई कुल्हाड़ियों से पेड़ को काट रहा है।



कवयित्री पेड़ो के लिए किनसे सवाल कर रहे है ?


कवयित्री पेड़ो के लिए 'सभ्य समाज' (नागरिक समाज) से सवाल पूछ रहे है जो लोग अपने उपयोग के लिए पेड़ो को नष्ट कर रहे है। 



जो कवयित्री का पेड़ो के बारे में कल्पना है उसके बारे में वास्तविक(सच) लिखिए।


कवयित्री ने पेड़ो के बारे में जो कल्पना किए है उसका सचाई है की इसे पेड़ घट रहा है , हरियाली घट रही है और मानव जीवन पर इसका घतक प्रभाव हो रहा है, और इन सभ का जिम्मेदार हम है।



कवयित्री पेड़ो के लिए मनुष्य से क्या कहा है ?


कवयित्री पेड़ के लिए मनुष्य से यह कहते है की वह अपना स्वार्थ छोड़कर चीखते हुए पेड़ो का दुख महसूस करे और उन्हें बचाये। पेड़ो की टहनियों को उन्होंने बचाव के लिए पुकारती हाथ के साथ वर्णन किया है |



कवयित्री ने पेड़ को मनुष्य से किस तरह जोड़ा है ?


कवयित्री ने पेड़ को मनुष्य से जोड़ा जैसे मनुष्य के अंदर जीवन है उसी तरह पेड़ में भी जीवन है| जब मनुष्य उन्हें काटता है उन्हें भी दर्द होता है जैसे अगर कोई मनुष्य का हाथ को काटे।



कवयित्री अपने दूसरे अंश में किसके दुख के बारे में बता रहे है और क्या बता रहे है ?


कवयित्री अपने दूसरे अंश में नदी के दुख के बारे में बता रहे है जो नदी जल के रूप में हमे जीवन दे रही है हम उसे ही बरबाद कर रहे है जैसे कारखाना का गंदा पानी नदी में गिरना, कूड़ा भी नदी में डाल देना। श्रद्धा और धर्म के नाम पर कोई भी चीज़े नदी में बहा देना , और रोकने पर भी नदी पे साबुन लगाकर नहना यह सबसे स्वच्छ नदी गंदा हो जाता है। यह वजसे नदी दुख है।



कवयित्री ने दुखी नदी के बारे में क्या पूछा है मनुष्य से?


कवयित्री दुखी नदी के बारे में मनुष्य से यह पूछा है की क्या कभी तुम नदी के रोना का आवाज सुना है जो वह रात को रोती है जो कवयित्री कल्पना कर रहे और वह नदी का रोने को महसूस कर सकती है।जैसे मनुष्य को कोई दुख होता है वह अकेले में जाकर रोता है वैसे ही नदी भी अपने घटते पानी और बढ़ते प्रदूषण के वजसे से रो रहा है।



कवयित्री नदी का कौनसा दो किनारो का चित्रण किया है ?


कवयित्री एक किनारे में स्वार्थी व्यक्ति अपने पाले जाने वाले पशु को नहला रहा है और कोई साबुन से अपने महले कपडे दो रहा है जिसे नदी का जल गंदा हो रहा है, और दूसरे किनारे कोई प्यासा पानी पी रहा है कोई स्त्री देवता को जल चढ़ा रही है। पीने और देव को जल चढ़ाने के लिए स्वच्छ पानी चाहिए पर और प्रदूषित पानी पीने के लिए हानिकारक है और गंदा पानी हम देव को नहीं चढ़ा सकते है। तो कवयित्री कहते है हम जब नदी का पानी का उपयोग अच्छे से करना चाहिए अगर नहीं करेंगे तो उसे दुसरो पर क्या प्रभाव होगा उसके बारे में सोचना चाहिए।



प्रकृति और नदी के प्रति मनुष्य का क्या कर्तव्य है ?


हमे प्रकृति को अच्छा रकना चाहिए क्यूंकि प्रकृति में सिर्फ हमारा ही हक़ नहीं सबका हक़ है अगर हम अच्छे से रखेंगे तो आने वाले पीढ़ी भी हम याद करके खुश होंगे और प्रकृति के साथ अच्छा व्यहवहार करेंगे। और नदी के प्रति हमारा यह कर्तव्य है की हम नदी को सूखने से बचाये, नदी को गंदा ना करे , उसे साफ रखे और कुए को बढ़ाये ताकि नदी पर निर्भर कम हो हमारा। इसे हमे और आने वाले पीढ़ी को फायदा होगा।



कवयित्री पहाड़ के बारे में क्या महसूस करते है ?


कवयित्री पहाड़ का कष्ट महसूस करते है जो डरा हुआ है। पहाड़ के टुकड़े किये जाते है और मानव इसे अपने लिए घर बनाने के लिए इस्तेमाल करते है |



कवयित्री ने मनुष्य का पहाड़ के प्रति कौनसा व्यहवार के बारे में बताया है?


कवयित्री कहते है मनुष्य एक तरफ निर्माण करता है (कोई चीज़ बनाना) तो दूसरी तरफ विनाश(नष्ट) करता है। जैसे वह बड़े बड़े ईमारत बनाने के लिए पहाड़ो को विस्फोट करता है , जिसे पहाड़ का सीना देहल जाता है। कवयित्री पहाड़ का बिखरते पत्थरो का चीख सुनते है।



कवयित्री ने हवा को कैसा दिखाया है ?


कवयित्री ने हवा को खून की उल्टियाँ करते हुए दिखाया है।



कवी ने हवा से प्रदूषित होने से बचाने का आग्रह क्यों दिया है ?


कवी ने घर के पिछवाड़ा (पीछे का हिस्सा) का उद्धरण देते हुए कहा है जैसे हम घर के सामने का हिंसा हमेशा साफ़ रखते है लेकिन घर के पीछे का हिंसा का ध्यान नहीं रखते है जहँ कूड़ा कचरा फेकते है और उसे गंदगी - बदबू फैलती है। बहार की सफाई अंदर की गंदगी को कम नहीं कर सकती है इसे हमे बचना चाहिए।



इस कविता में पृथ्वी को बूढ़ी क्यों कहा गया है ?


इस कविता में पृथ्वी को बूढ़ी इसलिए कहा गया है क्यूंकि पेड़ - पौधे का कम होना , नदीं का सुकना , पहाड़ो का नष्ट होना , पानी का गंदा होना , हवा का प्रदूषित होना अगर यह सब होगा तो पृथ्वी बूढ़ी ही दिखेंगी ना। जैसे बुढ़ापे में दात गिर जाता है , शरीर पर झुर्रियां आता है , बाल सफ़ेद होता है और शरीर रोगी हो जाता है। जैसे हम बुढ़ापे से पहले अपना दयँ रखते है वैसे ही हमे पृथ्वी का भी ध्यान रखना चाहिए।



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